महाप्रतापी चौहान राजवंश के वंशज — जैन डूंगरवाल एवं धाकड़


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उत्पत्ति

चौहान वंश की उत्पत्ति आबूगढ़ पर्वत पर हुई थी। इस वंश के प्रथम राजा श्री वसुदेव चौहान माने जाते हैं। उनके वंशजों में श्री पृथ्वीराज चौहान तृतीय हुए, जिन्होंने अजमेर और दिल्ली पर शासन किया।

वंशावली

  • श्री पृथ्वीराज चौहान (तृतीय)
  • उनके पुत्र — श्री चीता जी और श्री अखेरा जी
  • श्री अखेरा जी की भार्या — श्रीमती हाकी देवी
  • श्री अखेरा जी के पुत्र — श्री जगदेव जी, श्री अमर सिंह जी, श्री कर्पूर चंद्र जी एवं श्री वीरसेन जी

जैन धर्म ग्रहण

एक समय श्री अखेरा जी के चारों पुत्र शिकार के लिए वन में गए। वहाँ उन्हें जैन गुरुदेव श्री शांति सूरी जी तपस्या करते हुए मिले। चारों भाइयों ने गुरुदेव के चरणों में वंदन किया और उनसे धर्मोपदेश सुना।

गुरुदेव ने उन्हें जैन धर्म ग्रहण करने, जीवदया का पालन करने, शिकार का त्याग करने तथा सम्यग्-दर्शन, सम्यग्-ज्ञान और सम्यग्-चरित्र के मार्ग पर चलने का उपदेश दिया।

चारों भाइयों ने गुरुदेव की आज्ञा का पालन करते हुए जैन धर्म ग्रहण किया। उन्होंने तीन दिन तक तेला पचकाया और गुरुदेव के उपदेश सुने। जैन धर्म ग्रहण करने के पश्चात गुरुदेव ने उन्हें माता अम्बा जी का ध्यान कराया।

माता अम्बा का आशीर्वाद

कुलदेवी माता अम्बा जी

माता अम्बा जी ने बिल्व वृक्ष को फाड़कर दर्शन दिए और गुरुदेव के समक्ष प्रकट हुईं। गुरुदेव ने माताजी से राजकुमारों के कष्टों का निवारण करने की प्रार्थना की।

माताजी ने उन्हें वरदान दिया। इसके पश्चात उन्होंने डूंगरों में प्रतिबोध दिया और डूंगरवाल गोत्र की स्थापना हुई। बिल्व वृक्ष से प्रकट होने के कारण कुलदेवी माताजी का नाम बिलाव माताजी हुआ।

​हमारे कुल के पूज्य भैरु जी — पाँच पत्थर वाले भैरु जी

हमारे कुल के पूज्य भैरु जी  — पाँच पत्थर वाले भैरु जी

प्रथम डूंगरवाल

श्री जगदेव जी प्रथम डूंगरवाल हुए तथा उन्होंने चांग गाँव में निवास स्थापित किया।

धाकड़ गोत्र — डूंगरवाल गोत्र की शाखा

हमारे कुछ पूर्वज चांग से सन् 1282 (संवत 1225) में धाकड़ी गाँव ↗ में आकर बसे। यह गाँव पाली और सोजत के मार्ग में स्थित है।

इसी स्थान से ‘धाकड़’ शब्द का प्रयोग गोत्र के रूप में होने लगा, जो डूंगरवाल गोत्र की एक शाखा के रूप में आगे विकसित हुआ।

? पाण्डुलिपियों में धाकड़ गोत्र (डूंगरवाल गोत्र की शाखा) का उल्लेख: दस्तावेज़ देखें ↗

रामपुरा प्रवास

तत्पश्चात श्री जसराज जी धाकड़ लगभग सन् 1734 में रामपुरा, मध्य प्रदेश प्रवास हेतु आए।

ऐतिहासिक स्रोत

उपरोक्त सभी तथ्य हमारे परिवार की प्राचीन पाण्डुलिपियों पर आधारित हैं।

नीचे उपलब्ध पाण्डुलिपियों के मूल पृष्ठ देखे जा सकते हैं:

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अपनी जड़ों की खोज

एक खोज, जो वर्षों से जारी है

वर्ष 1986 की बात है। हर वर्ष की भांति मेरा अपने गाँव रामपुरा जाना हुआ। वहाँ आदरणीय काका सा. श्री धन्य कुमार जी धाकड़ के सहयोग से मुझे हमारे परिवार का 16 पीढ़ियों का वंश वृक्ष देखने का अवसर मिला।

उस दिन मन में एक सहज-सा प्रश्न उठा— हमसे पहले कौन थे? वे कहाँ रहते थे? और हमारा परिवार आज यहाँ तक कैसे पहुँचा?

यही जिज्ञासा धीरे-धीरे एक गहरी खोज में बदल गई। वर्षों तक पुराने नामों, स्थानों, पारिवारिक स्मृतियों और उपलब्ध दस्तावेज़ों को जोड़ने का प्रयास चलता रहा। इसी खोज के दौरान कुछ प्राचीन पाण्डुलिपियाँ प्राप्त हुईं, जिन्होंने इस यात्रा को एक नया आधार दिया।

और आज, उसी निरंतर खोज का परिणाम आपके सामने है— 60 से अधिक पीढ़ियों से जुड़ा हमारे परिवार का विशाल वंश वृक्ष।

हर परिवार की अपनी एक कहानी होती है

हर परिवार में कभी न कभी कोई ऐसा व्यक्ति होता है, जिसे अपने अतीत को जानने की जिज्ञासा होती है। वह पुराने नामों और स्मृतियों को जोड़ता है, बिखरी हुई कड़ियों को खोजता है और कोशिश करता है कि पिछली पीढ़ियों की कहानी अगली पीढ़ी तक पहुँच सके।

पूर्वजों को जानना केवल उनके नाम याद रखना नहीं है। यह यह समझने की कोशिश भी है कि हम कहाँ से आए हैं, किन लोगों ने हमारे परिवार की नींव रखी और कितनी पीढ़ियों की यात्रा के बाद हम आज यहाँ पहुँचे हैं।

वंशावली — अतीत से जुड़ने का एक माध्यम

वंशावली केवल नामों और तिथियों का संग्रह नहीं है। इसके पीछे उन असंख्य लोगों की जीवन-यात्राएँ हैं, जिनके प्रयासों, निर्णयों और संघर्षों ने आने वाली पीढ़ियों के लिए रास्ता बनाया।

हम अपनी जड़ों के केवल खोजकर्ता नहीं, बल्कि उनके कहानीकार और संरक्षक भी हैं। जब हम अपने पूर्वजों को खोजते हैं, तो कई बार उनके साथ-साथ अपने बारे में भी कुछ नया जान पाते हैं।

इसी विचार ने इस वंशावली को केवल एक रिकॉर्ड के रूप में नहीं, बल्कि हमारे परिवार की सामूहिक स्मृति के रूप में संजोने की प्रेरणा दी।

यह केवल एक वंश वृक्ष नहीं है

यह मेरे लिए केवल तथ्यों और नामों को दर्ज करने का कार्य नहीं रहा। यह वर्षों से चली आ रही एक व्यक्तिगत खोज है—अपनी पहचान, अपनी जड़ों और अपने परिवार की यात्रा को समझने का प्रयास।

यह वंश वृक्ष उन सभी पीढ़ियों को सम्मान देने का एक माध्यम है, जिन्होंने इस परिवार की कहानी को आगे बढ़ाया और जिनकी वजह से हम आज इस यात्रा का हिस्सा हैं।

आभार और आशा

माता-पिता का आशीर्वाद तथा पत्नी और बच्चों का निरंतर समर्थन इस लंबे प्रयास के सबसे महत्वपूर्ण आधार रहे हैं। उनके सहयोग के बिना यह कार्य आज आपके सामने इस रूप में प्रस्तुत नहीं हो पाता।

मैं दादा भाई श्री महावीर विमल चंद जी धाकड़ के प्रति विशेष कृतज्ञता व्यक्त करता हूँ। उनके मार्गदर्शन के माध्यम से मुझे अपने कुलगुरु से मिलने और कुछ प्राचीन पाण्डुलिपियों को प्राप्त करने का अवसर मिला, जिसने इस खोज को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

यह सम्पूर्ण डूंगरवाल तथा धाकड़ परिवार की साझा धरोहर है। आशा है कि यह प्रयास आने वाली पीढ़ियों को अपने परिवार के इतिहास को जानने, समझने और सुरक्षित रखने के लिए प्रेरित करता रहेगा।

शरत धाकड़

शरत धाकड़

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Photos

हमारे कुल के पूज्य भैरु जी  — पाँच पत्थर वाले भैरु जी
हमारे कुल के पूज्य भैरु जी — पाँच पत्थर वाले भैरु जी
पूज्य भैरु जी स्थान लोकेशन, चांग, ब्यावर:
https://maps.app.goo.gl/eV6MDj1RscRBXBqw9

Address: श्री भेरुजी मंदिर (घाटा वाले भेरुजी), अमरगढ़ चांग, ब्यावर, राजस्थान 305901 
Family Tree, Shri Roopa Ji Dungarwal,Thanwala
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Sharat Ji DHAKAD
(At least one living or private individual is linked to this item - Details withheld.) 

Individuals

DHAKAD, Sushila Ji
   b. 11 Oct 1943, Bhawani Mandi, Rajasthan, India
DHAKAD, Ajay Kumar Ji
   b. 29 Jul 1947, Indore, Madhya Pradesh, India
DHAKAD, Raja Bahadur Ji
   b. 7 May 1945, Indore, Madhya Pradesh, India


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